ज्ञान क्या है? इसकी परिभाषा, प्रकार, अर्थ और स्रोत

ज्ञान क्या है

ज्ञान से क्या अभिप्राय है? क्या आप जानते हैं कि ज्ञान क्या होता है। ज्ञान से क्या तात्पर्य है? अगर आपको ज्ञान का सही अर्थ पता नहीं है। तब इस लेख को जरूर पढ़िए। क्योंकि इस लेख में हमने ज्ञान को विस्तारपूर्वक बताया गया है। जिसमें बताया गया है कि ज्ञान क्या है, ज्ञान का अर्थ, ज्ञान की परिभाषा, ज्ञान के प्रकार, ज्ञान के स्रोत और ज्ञान संबंधित प्रश्नों के उत्तर बताइए गए हैं। जैसे; ज्ञान का विलोम और ज्ञान का पर्यायवाची शब्द आदि।

ज्ञान का सामान्य और व्यवहारिक अर्थ जानना होता है। लेकिन ज्ञान का एक व्यापक और गुढ़ अर्थ भी है। जिसकी खोज में लोग अपना कई जन्म लगा देते हैं। खैर इसपर हम बात नहीं करने वाले हैं। क्योंकि इसे समझना आसान नहीं है। इसे समझने के लिए पूरा जीवन कम पड़ जाता है। वैसे भी इसे पढ़कर समझा भी नहीं जा सकता है। क्योंकि उस ज्ञान को व्याख्या या वर्णन नहीं कर सकते हैं। उस परम ज्ञान को पा लेना सबकुछ पा लेने के बराबर होता है। अध्यात्मिक में ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया गया है।

कहा गया है कि यह मनुष्य को उन्नत और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। तो चलिए हम अपने प्रश्न पर आते हैं कि आखिर ज्ञान का क्या अर्थ है। कई लोगो ने ज्ञान के अर्थ और परिभाषा को भिन्न-भिन्न रुप में बताया है। यहाँ हम प्रमुख व्यक्तियों के द्वारा बताए परिभाषा को जानेंगे। तो चलिए सबसे पहले जानते हैं कि ज्ञान क्या है?

ज्ञान क्या है? (What is Knowledge in Hindi)

किसी विषय, वस्तु घटना आदि की संपूर्ण जानकारी होना उस वस्तु का ज्ञान कहलाता है। यानी जिसके बाद जानने को कुछ भी शेष ना रहे। ज्ञान शब्द का अर्थ ही होता है जानना या जान लेना। जैसे; अगर मैं आपसे पुछू की क्या आपको स्मार्टफोन का ज्ञान है? तब इससे आप क्या समझेंगे यही ना की आपको स्मार्टफोन की जानकारी है या नहीं। स्वयं तथा अपने आसपास के तत्वों की बोध होना या समझने की शक्ति ज्ञान है। ज्ञान शब्द दर्शाता है कि हम क्या जानते हैं।

ज्ञान एक प्रकार की मनोदशा है, ज्ञाता के मन में होनेवाली एक तरह की हलचल है। वह बौध्दिक अनुभव जो ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्राप्त होता है। ज्ञान कहलाता है। मनुष्य में पाँच ज्ञानेंद्रियों होता है। ज्ञान हमारे मष्तिष्क को विकसित करने का काम करता है। ज्ञान के आधार पर ही हम विभिन्न प्रकार के कार्यों को करते हैं और अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ते हैं। यानी कि उन्नति करते हैं। ज्ञान ही उन्नति, तरक्की, आगे बढ़ने की शक्ति और अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देती है। ज्ञान अथाह है अनंत है। इसे जितना खोजते जाओ, उतने बढ़ते जाता है।

ज्ञान का अर्थ (Gyan Meaning in Hindi)

ज्ञान शब्द “ज्ञ” धातु से बना है। जिसका अर्थ जानना, बोध और अनुभव आदि होता है। यानी किसी भी वस्तु (जो हमारे आसपास है) के स्वरूप का अर्थात जैसा वह है, उसे वैसे ही जानना, अनुभव और बोध होना उस वस्तु का ज्ञान कहलाता है। आसान भाषा में कहे तो किसी वस्तु की सही जानकारी होना ज्ञान है। यानी ज्ञान शब्द का प्रयोग किसी विषय या वस्तु के यथार्थ जानकारी के लिए होता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी विषय, वस्तु या घटना की सत्यता की जानकारी होना ज्ञान है। किसी भी विषय वस्तु अथवा घटना के प्रति जागरूकता और साक्षेदारी ही ज्ञान कहलाता है। ज्ञान शब्द किसी विषय वस्तु की सैद्धांतिक या व्यवहारिक समझ को संदर्भित करता है।

ज्ञान की परिभाषा (definition of knowledge in hindi)

सामान्यतः ज्ञान का तात्पर्य किसी जानकारी से होती है, जो हमें ज्ञात है। ज्ञान एक बौध्दिक अनुभव है, जो हमारे ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त होता है। ज्ञान प्राप्त या ग्रहण करने के लिए विचार, चिंतन, मनन, मंथन और अनुभव की शक्ति होना चाहिए। जो कि हम मनुष्यों के पास होती है। अगर ज्ञान की परिभाषा की बात करे। तो कई विद्वानों ने इसे परिभाषित करने की कोशिश की है। यहाँ हमने कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दिए गए परिभाषा बताए हैं। जो इस प्रकार है –

  • शंकराचार्य के अनुसार – ब्रह्म को सत्य जानना ज्ञान है और वस्तु जगत को सत्य जानना अज्ञान है।
  • बौद्ध दर्शन के अनुसार – जो मनुष्य को सांसारिक दुःखों से छुटकारा दिलाए वो ज्ञान है।
  • प्लेटो के अनुसार – विचारो की दैवीय व्यवस्था और आत्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानना ही सच्चा ज्ञान है।
  • हॉब्स के अनुसार – ज्ञान ही शक्ति है।
  • सुकरात के अनुसार – ज्ञान सर्वोच्च सद्गुण है।
  • वेबस्टर के अनुसार – वह जानकारी है जो वास्तविक अनुभव, व्यवहारिक अनुभव और कार्यकुशलता आदि द्वारा प्राप्त होती है।

ज्ञान के प्रकार (Types of Knowledge in Hindi)

मुख्य रूप से हम तीन प्रकार के ज्ञान का वर्णन कर सकते हैं।

  1. आगमनात्मक ज्ञान (A Posteriori Knowledge)
  2. प्रयोगमूलक ज्ञान (Experimental Knowledge)
  3. प्रागनुभव ज्ञान (Apriori Knowledge)

1. आगमनात्मक ज्ञान (A Posteriori Knowledge)

आगमनात्मक ज्ञान हमारे अनुभव तथा निरिक्षण पर आधारित होता है। जॉन लॉक इस प्रकार के ज्ञान के प्रवर्तक हैं। वे कहते हैं कि जैसे-जैसे अनुभव मिलते हैं, उसी प्रकार ज्ञान में वृद्धि होते रहता है। इससे तात्पर्य होता है कि ज्ञान अनुभवों के द्वारा वृद्धि करता रहता है।

2. प्रयोगमूलक ज्ञान (Experimental Knowledge)

ज्ञान प्रयोग द्वारा प्राप्त होता है, ऐसा प्रयोजनवादी मानते हैं। ऐसी ड्यूवी (Dewey) कहते हैं कि ज्ञान ‘एक प्रयास एवं सहन’ की प्रक्रिया है। एक विचार के अभ्यास में प्रयास करना और उस प्रयास के परिणाम से जो फल प्राप्त होंगे उनसे सीखना। इसके अनुसार हम कह सकते हैं कि ज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे हम समझें कि वह अनुभव या निरिक्षण से अंतिम रुप से समझी जा सकती है।

3. प्रागनुभव ज्ञान (Apriori Knowledge)

ज्ञान को स्वयं प्रत्यक्ष की भांति समझा जाता है। जब सिद्धांत को समझ लिए जाते हैं, सत्य पहचान लिए जाते हैं। फिर उसे निरिक्षण, अनुभव या फिर प्रयोग द्वारा प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती है। इस विचारधारा के प्रवर्तक कान्ट है। ये कहते हैं कि सामान्य सत्य अनुभव से स्वतंत्र होने चाहिए। उन्हें स्वयं में स्पष्ट एवं निश्चित होना चाहिए। गणित का ज्ञान प्रागनुभव ज्ञान समझा जाता है। क्योंकि गणित का ज्ञान स्वयं में स्पष्ट एवं निश्चित होता है।

उपर्युक्त वर्णन के अनुसार एक प्रकार का ज्ञान अनुभव से प्राप्त होता है। दूसरे प्रकार का ज्ञान प्रयोग, निरिक्षण एवं अनुभव के द्वारा प्राप्त होता है तथा तीसरे प्रकार के ज्ञान अनुभव से परे होते है। इसके लिए अनुभव की आवश्यकता नहीं होती है।

ज्ञान के स्रोत (Sources of Knowledge in Hindi)

मनुष्य के पास पाँच तरह की ज्ञानेन्द्रियाँ होती है। जिससे हम मनुष्य किसी ज्ञान को प्राप्त कर पाते हैं। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ इस प्रकार है आँख, नाक, कान, त्वचा और जिह्वा, हम मनुष्य आँख से देखकर, नाक से सूंघकर, कान से सुनकर, त्वचा से महसूस कर तथा जिह्वा से स्वाद परख कर ज्ञान प्राप्त करते है। लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन ज्ञानेन्द्रियाँ के अलावा कोई माध्यम या स्रोत भी होना जरूरी है। जैसे; नाक से ज्ञान प्राप्त करने के लिए माध्यम के रुप में सुगंध होना जरूरी है। इसी तरह यहाँ हम कुछ ऐसे माध्यम को जानेंगे। जिससे कि हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

  1. प्रकृति (Nature)
  2. इंद्रिय अनुभव (Sense Experience)
  3. साक्ष्य (Testimony)
  4. तर्क बुद्धि (Logical Intelligence)
  5. अन्तःप्रज्ञा (Intuition)
  6. सत्ता अधिकारीक ज्ञान (Authoritative Knowledge)
  7. संवाद (Conversation)

1. प्रकृति (Nature)

प्रकृति, ज्ञान का प्रथम और प्रमुख स्रोत है। प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति से अपने योग्यता अनुरूप हमेशा कुछ ना कुछ सीखता रहता है। जैसे; फलदार वृक्ष हमेशा झुका रहा है, वह पतझर की तरह नहीं रहता तथा चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करती है और पृथ्वी सुर्य की परिक्रमा करती है। ये सभी प्रक्रिया अपने आप घटित होते रहता है और इन्हीं प्रक्रिया से दिन-रात तथा मौसम परिवर्तन होता है। इस तरह प्रकृति अपने नियमों का पालन करती है और हम इनसे बहुत कुछ सीखते हैं। प्रकृति हमें सीखाती और हम सीखते हैं। इस तरह हमारा ज्ञान की प्राप्ति होती है।

2. इंद्रिय अनुभव (Sense Experience)

ज्ञान प्राप्त करने का प्रमुख साधन इंद्रिय ही है। इन इंद्रिय द्वारा प्राप्त अनुभव इंद्रिय अनुभव कहलाता है। मनुष्य के पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा इत्यादि होती है। इन ज्ञानेन्द्रियों से क्रमशः देखकर, सुनकर, सूंघकर, स्पर्श कर तथा स्वाद लेकर सांसारिक वस्तुओं के बारे में विभिन्न तरह के ज्ञान प्राप्त होता है।

3. साक्ष्य (Testimony)

जब हम किसी अन्य के अनुभव और निरिक्षण आधारित ज्ञान को मान्यता देते हैं। तब इसे साक्ष्य कहते हैं। साक्ष्य से प्राप्त ज्ञान को व्यक्ति स्वयं निरिक्षण नहीं करता है। यह दूसरे के निरिक्षण पर आधारित होता है। हम अपने पूरे जीवन में साक्ष्य से बहुत तरह के ज्ञान प्राप्त करते हैं। जैसे; किताबों में बताए गए बहुत सारे तथ्यों और घटनाओं का ज्ञान जिसे हमने खुद नहीं देखा या अनुभव किया होता है। जैस; ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया था। हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या हमने देखा था कि शाहजहाँ ने ही ताजमहल बनवाया है। नहीं ना, फिर भी हमें विश्वास है।

4. तर्क बुद्धि (Logical Intelligence)

अनुभव से हमें ज्ञान की प्राप्ति होता है। यही तर्क में परिवर्तित हो जाता है। जब इस ज्ञान को प्रमाणित और स्पष्ट किया जाता है। तर्क बुद्धि मानसिक प्रक्रिया या योग्यता है। यही हमारे सोच और समझ का आधार होता है। इसके बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है।

5. अन्तःप्रज्ञा (Intuition)

इसे भी ज्ञान प्राप्ति का मुख्य स्रोत कहा गया है। यह एक तरह का आंतरिक बोध होता है। जिसमें ज्ञान की स्पष्टता निहित रहता है। अंतः से तात्पर्य किसी तथ्य को अपने मन में जानना होता है। इसके लिए तर्क की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि उस ज्ञान में हमारा पूर्ण विश्वास होता है।

6. सत्ता अधिकारीक ज्ञान (Authoritative Knowledge)

उच्च शिक्षित व्यक्तियों द्वारा दिया गया ज्ञान सत्ता अधिकारीक ज्ञान कहलाता है। अब तो मनोवैज्ञान से भी यह सिद्ध कर दिया है कि कुछ मनुष्य अत्यंत प्रभावशाली होते हैं। जिसकी संख्या बहुत कम होती है। यही लोग ज्ञान के क्षेत्र में कुछ बड़ा करते हैं। इसलिए इन महान व्यक्ति को ज्ञान के क्षेत्र में सत्ता (Authority) माना जाता है।

7. संवाद (Conversation)

संवाद को हमेशा से ही ज्ञान प्राप्ति तथा बढ़ाने का स्रोत माना गया है। इसके जरिए हम विभिन्न लोगों से ज्ञान प्राप्त व आत्मसात कर सकते हैं। जैसे; प्राचीन भारत में किसी गूढ़ विषय के असली अर्थ जानने के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों के साथ शास्त्रार्थ (चर्चा) किया जाता था।

ज्ञान के संबंध में निम्नलिखित बातों का उजागर होता है-
  • ज्ञान ही सत्य है।
  • ज्ञान ही अज्ञानता और अंधविश्वास को दूर करता है।
  • ज्ञान ही शक्ति है।
  • ज्ञान क्रमबद्ध प्राप्त होता है। आकस्मिक नहीं।
  • ज्ञान बांटने से बढ़ता है।
  • ज्ञान अनंत है।

ज्ञान संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. ज्ञान किसे कहते हैं?

वह जानकारी जो वास्तविक हो सत्य हो ज्ञान कहलाता है।

2. ज्ञान का विलोम शब्द क्या है?

ज्ञान का विलोम शब्द अज्ञान है। चाणक्य ने अज्ञान को ही मनुष्यों का सबसे बड़ा शत्रु बताया है।

3. ज्ञान के पर्यायवाची शब्द क्या है?

ज्ञान का पर्यायवाची शब्द बोध, विवेक, समझ, जानकारी इल्म, परिचय और आत्मज्ञान इत्यादि है।

4. अज्ञान किसे कहते हैं?

ज्ञान शब्द के विलोम को अज्ञान कहते हैं। जिसका मतलब ज्ञान का अभाव होता है।

Conclusion – Knowledge in Hindi

इस लेख में ज्ञान की विस्तृत जानकारी बताया गया है। जिसमें ज्ञान क्या है, ज्ञान की परिभाषा, ज्ञान का अर्थ, ज्ञान के प्रकार और ज्ञान के स्रोत इत्यादि बताया गया है। उम्मीद करता हूँ कि यह ज्ञानवर्धक लेख पसंद आया होगा। इसी तरह की ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए Gyanveda (www.gyanveda.in) ब्लॉग पर Visit करते रहिए।

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